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रंग बदलता मौसम

रंग बदलता मौसम

पिछले कई दिनों से दिल्ली में भीषण गरमी पड़ रही थी लेकिन आज मौसम अचानक खुशनुमा हो उठा था। प्रात: से ही रुक-रुक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। धूप का कहीं नामोनिशान नहीं था।
मैं बहुत खुश था। सुहावना और ख़ुशनुमा मौसम मेरी इस ख़ुशी का एक छोटा-सा कारण तो था लेकिन बड़ा और असली कारण कुछ और था। आज रंजना दिल्ली आ रही थी और मुझे उसे पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रिसीव करने जाना था। इस खुशगवार मौसम में रंजना के साथ की कल्पना ने मुझे भीतर तक रोमांचित किया हुआ था।
हल्की बूँदाबाँदी के बावजूद मैं स्टेशन पर समय से पहले पहुँच गया था। रंजना देहरादून से जिस गाड़ी से आ रही थी, वह अपने निर्धारित समय से चालीस मिनट देर से चल रही थी। गाड़ी का लेट होना मेरे अंदर खीझ पैदा कर रहा था लेकिन रंजना की यादों ने इस चालीस पैंतालीस मिनट के अन्तराल का अहसास ही नहीं होने दिया।
परसों जब दफ्तर में रंजना का फोन आया तो सिर से पाँव तक मेरे शरीर में ख़ुशी और आनन्द की मिलीजुली एक लहर दौड़ गई थी। फोन पर उसने बताया था कि वह इस रविवार को मसूरी एक्सप्रेस से दिल्ली आ रही है और उसे उसी दिन शाम चार बजे की ट्रेन लेकर कानपुर जाना है। बीच का समय वह मेरे संग गुज़ारना चाहती थी। उसने पूछा था- ''क्या तुम आओगे स्टेशन पर?''
''कैसी बात करती हो रंजना ! तुम बुलाओ और मैं न आऊं, यह कैसे हो सकता है? मैं स्टेशन पर तुम्हारी प्रतीक्षा करता खड़ा मिलूँगा।''
फोन पर रंजना से बात होने के बाद मैं जैसे हवा में उड़ने लगा था। बीच का एक दिन मुझसे काटना कठिन हो गया था। शनिवार की रात बिस्तर पर करवटें बदलते ही बीती।
करीब चारेक बरस पहले रंजना से मेरी पहली मुलाकात दिल्ली में ही हुई थी- एक परीक्षा केन्द्र पर। हम दोनों एक नौकरी के लिए परीक्षा दे रहे थे। परीक्षा हॉल में हमारी सीटें साथ-साथ थीं। पहले दिन सरसरी तौर पर हुई हमारी बातचीत बढ़कर यहाँ तक पहुँची कि पूरी परीक्षा के दौरान हम एक साथ रहे, एक साथ हमने चाय पी, दोपहर का खाना भी मिलकर खाया। वह दिल्ली में अपने किसी रिश्तेदार के घर में ठहरी हुई थी। तीसरे दिन जब हमारी परीक्षा खत्म हुई तो रंजना ने कहा था- ''मैं पेपर्स की थकान मिटाना चाहती हूँ अब। इसमें तुम मेरी मदद करो।''
पिछले तीन दिनों से परीक्षा के दौरान हम दिन भर साथ रहे थे। अब परीक्षा खत्म होने पर रंजना का साथ छूटने का दुख मुझे अंदर ही अंदर सता रहा था। मैंने रंजना की बात सुनकर पूछा- ''वह कैसे?''
''मैं दिल्ली अधिक घूमी नहीं हूँ। कल दिल्ली घूमना चाहती हूँ। परसों देहरादून लौट जाऊँगी।'' कहते हुए वह मेरे चेहरे की ओर कुछ पल देखती रही थी।
मैं उसका आशय समझ गया था। उसके प्रस्ताव पर मैं खुश था लेकिन एक भय मेरे भीतर कुलबुलाने लगा था। बेकारी के दिन थे। घर से दिल्ली में आकर परीक्षा देने और यहाँ तीन दिन ठहरने लायक ही पैसों का इंतज़ाम करके आया था। मेरी जेब में बचे हुए पैसे मुझे रंजना के साथ पूरा दिन दिल्ली घूमने की इजाज़त नहीं देते थे।
''दिल्ली तो मैं भी पहली बार आया हूँ, इस परीक्षा के सिलसिले में। घूमना तो चाहता हूँ पर...।''
''पर वर कुछ नहीं। कल हम दोनों दिल्ली घूमेंगे, बस।'' रंजना ने जैसे अंतिम निर्णय सुना दिया। परीक्षा केन्द्र इंडिया गेट के पास था। वह बोली, ''कल सुबह नौ बजे तुम यहीं मिलना।''
यूँ तो मुझे परीक्षा समाप्त होते ही गांव के लिए लौट जाना था, पर रंजना की बात ने मुझे एक दिन और दिल्ली में रुकने के लिए मजबूर कर दिया। मैं पहाड़गंज के एक छोटे-से होटल में एक सस्ता सा कमरा लेकर ठहरा हुआ था। जेब में बचे हुए पैसों का मैंने हिसाब लगाया तो पाया कि कमरे का किराया देकर और वापसी की ट्रेन का किराया निकाल कर जो पैसे बचते थे, उसमें रंजना को दिल्ली घुमाना क़तई संभव नहीं था। बहुत देर तक मैं ऊहापोह में घिरा रहा था- गांव लौट जाऊँ या फिर ...। रंजना की देह गंध मुझे खींच रही थी। मुझे रुकने को विवश कर रही थी। और जेब थी कि गांव लौट जाने को कह रही थी।
फिर मैंने एक फ़ैसला किया। रुक जाने का फ़ैसला। इसके लिए मुझे गले में पहनी पतली-सी सोने की चेन और हाथ की घड़ी अपनी जेब कट जाने का बहाना बनाकर पहाड़गंज में बेचनी पड़ी थी। अगले दिन मैं समय से निश्चित जगह पर पहुँच गया था। रंजना भी समय से आ गई थी। वह बहुत सुन्दर लग रही थी। उसका सूट उस पर खूब फब रहा था। उसके चेहरे पर उत्साह और उमँग की एक तितली नाच रही थी। एकाएक मेरा ध्यान अपने कपड़ों की ओर चला गया। मैं घर से दो जोड़ी कपड़े लेकर ही चला था। मेरी पैंट-कमीज और जूते साधारण-से थे। मन में एक हीन भावना रह-रह कर सिर उठा लेती थी। मेरे चेहरे को पढ़ते हुए रंजना ने कहा था, ''तुम कुछ मायूस-सा लगते हो। लगता है, तुम्हें मेरे संग दिल्ली घूमना अच्छा नहीं लग रहा।''
''नहीं, रंजना। ऐसी बात नहीं।'' मेरे मुँह से बस इतना ही निकला था।
हम दोनों ने उस दिन इंडिया गेट, पुराना किला, चिड़िया घर, कुतुब मीनार की सैर की। दोपहर में एक ढाबे पर भोजन किया। सारे समय हँसती-खिलखिलाती रंजना का साथ मुझे अच्छा लगता रहा था।
साल भर बाद इंटरव्यू के सिलसिले में हम फिर मिले थे। हमने फिर पूरा एक दिन दिल्ली की सड़कें नापी थीं। इसी दौरान रंजना ने बताया था कि उसके बड़े भाई यहाँ दिल्ली में एक्साइज विभाग में डेपूटेशन पर आने वाले हैं। उसने मुझे उनका पता देते हुए कहा था कि मैं उनसे अवश्य मिलूं।
कुछ महीनों बाद मुझे दिल्ली में भारत सरकार के एक मंत्रालय में नौकरी मिल गई। मैं रंजना के बड़े भाई साहब से उनके ऑफिस में जाकर मिला था। वह बड़ी गर्मजोशी में मुझसे मिले थे। उनसे ही पता चला कि नौकरी की ऑफर तो रंजना को भी आई थी, पर इस दौरान देहरादून के केन्द्रीय विद्यालय में बतौर अध्यापक नियुक्ति हो जाने के कारण उसने दिल्ली की नौकरी छोड़ दी थी। मैं उन्हें अपने ऑफिस का फोन नंबर देकर लौट आया था। मुझे रंजना का दिल्ली में नौकरी न करना अच्छा नहीं लगा था। फिर भी, मुझे उम्मीद थी कि रंजना से मेरी मुलाकात अवश्य होगी। लेकिन, रंजना के बड़े भाई साहब कुछ समय बाद दिल्ली से चंडीगढ़ चले गए और मेरे मन की चाहत मेरे मन में ही रह गई थी।
ट्रेन शोर मचाती हुई प्लेटफॉर्म पर लगी तो मैं अपनी यादों के समन्दर से बाहर निकला। रंजना ने मुझे प्लेटफॉर्म पर खड़ा देख लिया था। ट्रेन से उतरकर वह मेरी ओर बढ़ी। आज वह पहले से अधिक सुन्दर लग रही थी। सेहत भी उसकी अच्छी हो गई थी। सामान के नाम पर उसके पास एक बड़ा-सा अटैची था और कंधे पर लटकता एक छोटा-सा काला बैग। उसने कुली को आवाज़ दी। मैंने कहा, ''कुली की क्या ज़रूरत है। तेरे पास एक ही तो अटैची है। मैं उठा लूंगा।'' और मैंने अटैची पकड़ लिया था।

प्लेटफॉर्म पर चलते हुए रंजना ने कहा, ''मनीष, मेरे पास चार-पाँच घंटों का समय है। कानपुर जाने वाली शाम चार बजे वाली गाड़ी की मैंने रिज़र्वेशन करा रखी है। ऐसा करती हूँ, सामान मैं यहीं लॉक अप में रखवा देती हूँ और रिटायरिंग रूम में फ्रैश हो लेती हूँ। फिर हम शॉपिंग के लिए निकलेंगे। ठीक।''

मुझे भी रंजना का यह प्रस्ताव अच्छा लगा। मैं जहाँ रह रहा था वह जगह स्टेशन से काफी दूर थी, वहाँ आने-जाने में ही दो घंटे बर्बाद हो जाने थे। रिटायरिंग रूम में फ्रैश होने के बाद रंजना ने अटैची को लॉक अप में रखवाया और फिर हम दोनों स्टेशन से बाहर निकले। सवा ग्यारह बज रहे थे। मैंने पूछा- ''किधर चलोगी शॉपिंग के लिए?''
''करोल बाग चलते हैं।'' रंजना जैसे पहले से ही तय करके आई थी।
मैंने एक ऑटो वाले से बात की और करोल बाग के लिए चल दिए। ऑटो में सट कर बैठी रंजना की देह गंध मुझे दिवाना बना रही थी। मैंने चुटकी ली, ''पहले से कुछ मुटिया गई हो। टीचर की नौकरी लगता है, रास आ गई है।''
''तुम्हें मैं मोटी नज़र आ रही हूँ ?'' रंजना ने ऑंखें तरेरते हुए मेरी ओर देखकर कहा।
''मोटी न सही, पर पहले से सेहत अच्छी हो गई है। और सुन्दर भी हो गई हो।''
''अच्छा ! पहले मैं सुन्दर न थी?''
''मैंने यह कब कहा ?''
''अच्छा बताओ, तुम्हें मेरी याद आती थी?'' हवा से चेहरे पर आए अपने बालों को हाथ से पीछे करते हुए रंजना ने पूछा।
''बहुत! मैं तो तुझे भूला ही नहीं।''
''अच्छा !'' इस बार रंजना की मुस्कराहट में उसके मोती जैसे दांतों का लिश्कारा भी शामिल था।
''तुमने दिल्ली वाली नौकरी की ऑफर क्यों ठुकराई? यहाँ होती तो हम रोज मिला करते।''
''दरअसल मुझे दफ्तर की दिन भर की नौकरी से टीचर की नौकरी बहुत पसंद है। इसलिए जब अवसर मिला, वह भी केन्द्रीय विद्यालय का तो मैं उसे ठुकरा न सकी।''
तभी, ऑटो वाले ने करोलबाग के एक बाजार में ऑटो रोक दिया। हम उतर गए। ऑटो वाले को रंजना पैसे देने लगी तो मैंने रोक दिया। पैसे देकर हम दोनों बाजार में घूमने लगे। रंजना कई दुकानों के अन्दर गई। सामान उलट-पुलट कर देखती रही। कीमतें पूछती रही। भाव बनाती रही। उसे देखकर मुझे लगा, रंजना को शॉपिंग का अच्छा तजुर्बा हो जैसे। हमें बाजार में घूमते एक घंटे से ऊपर हो चुका था लेकिन रंजना ने अभी कुछ भी नहीं खरीदा था। मैंने पूछा, ''रंजना, तुझे लेना क्या है?''
उसने मेरी ओर देखा और हल्का-सा मुस्करा दी। फिर, वह उसी दुकान में जा घुसी जहाँ हम सबसे पहले गए थे। वह कपड़ों की दुकान थी। काफी देर बाद उसने दो रेडीमेड सूट खरीदे। पैसे देने लगी तो मैंने उसे रोक दिया। थोड़ी न-नुकर के बाद वह मान गई। मैंने पैसे दिए और सूट वाले थैले पकड़ लिए। फिर वह एक और दुकान में गई और तुरन्त ही बाहर निकल आई। वह मुझे बाजू से पकड़कर खींचती हुई -सी आगे बढ़ी और एक दूसरी दुकान में जा घुसी। उसने दो साड़ियाँ पसंद कीं। इस बार उसने अपना बटुआ नहीं खोला। साड़ियाँ कीमती थीं, मैंने पैसे अदा किए और दुकान से बाहर आ गए। बाहर निकलकर वह बोली, ''शॉपिंग करना कोई आसान काम नहीं।''
फिर वह फुटपाथ पर लगी दुकानों पर झुमके, बालियाँ और नेल-पालिश देखने लगी। पूरा बाजार घूम कर उसने दो-चार चीजें खरीदीं। मैंने घड़ी की तरफ देखा- दो बजने वाले थे।
''मनीष, मुझे जूती खरीदनी है।'' रंजना के कहने पर मैं उसे जूतियों वाले बाजार में ले गया। थैले उठाये मैं उसके पीछे-पीछे एक दुकान से दूसरी, दूसरी से तीसरी और तीसरी से चौथी दुकान घूमता रहा।
रंजना के संग घूमना हालाँकि मुझे अच्छा लग रहा था पर मैं एकांत में बैठकर उसके साथ बातें भी करना चाहता था। रंजना को लेकर जो स्वप्न मैंने देखे थे, उनके बारे में मैं उसे बताना चाहता था। मैंने सोचा था, रंजना घंटा, डेढ़-घंटा शॉपिंग करेगी, फिर हम किसी रेस्तरां में बैठकर लंच के साथ-साथ कुछ बातें भी शेयर करेंगे। समय मिला तो किसी पॉर्क में भी बैठेंगे। पर मेरी यह इच्छा पूरी होती नज़र नहीं आती थी।
रंजना तीन बजे तक सैंडिल ही पसंद करती रही। सैंडिल लेकर जब हम सड़क पर आए तो उसे जैसे एकाएक कुछ याद हो आया। वह रुक कर बोली, ''मनीष, एक चीज़ तो रह ही गई।''
''क्या ?'' सामान उठाये मैंने पूछा।
''छोटा सा अटैची या बैग लेना था।''
मैं कुछ न बोला। चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगा।
मुझे जोरों की भूख लगी हुई थी। मैंने पूछा, ''रंजना, तुम्हें भूख नहीं लगी? कुछ खा लेते हैं कहीं बैठ कर।''
उसने पहली बार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देखा था और समय देखकर हड़बड़ा उठी।
''नहीं-नहीं, मनीष। देर हो जाएगी। साढ़े तीन बज रहे हैं। चार बजे की ट्रेन है। अब बस चलो यहाँ से।''
ऑटो कर जब हम स्टेशन पहुँचे चार बजने में दस मिनट रहते थे। उसने फटाफट लॉक-अप रूम से अपना अटैची लिया। रंजना ने छोटा छोटा सामान अपने हाथों में ले लिया था और बोली थी, ''जल्दी करो, मनीष। कहीं गाड़ी न छूट जाए।''

ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लगी हुई थी। सामान उठाये मैं रंजना के पीछे-पीछे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। मेरी साँस फूल रही थीं। एकबार मन हुआ, कुली को बुला लूँ। लेकिन दूसरे ही क्षण अपने इस इरादे को रद्द करके मैं रंजना के पीछ-पीछे चलता रहा। रंजना ने अपना कोच ढूँढ़ा। यह एक टू-टायर डिब्बा था। मैंने उसका सारा सामान उसकी सीट के नीचे और उसकी सीट पर रखा। वह रूमाल से अपने माथे का पसीना पोंछ रही थी। ट्रेन छूटने में कुछ मिनट ही बाकी थी।
मैं डिब्बे से नीचे उतरा और रंजना के लिए पानी की बोतल लेने दौड़ा। पानी की बोतल लेकर लौटा तो देखा- प्लेटफॉर्म पर खड़ा एक युवक खिड़की के पास बैठी रंजना से बातें कर रहा था। दोनों की पीठ मेरी ओर थी। मैं कुछ फासला बनाकर पीछे ही खड़ा हो गया। उन दोनों की बातें मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थीं।
''मुझे पहचाना? मैं राकेश का दोस्त, कमल। राकेश जब आपके घर आपको देखने गया था, मैं उसके साथ था।''
''ओह आप!''
''मैं लखनऊ जा रहा हूँ। पिछले डिब्बे में मेरी सीट है। मैंने आपको डिब्बे में चढ़ते देख लिया था। आप किधर जा रही हैं?''
''कानपुर।''
''कौन रहता है वहाँ?''
''मेरी मौसी का घर है कानपुर में। उनकी बेटी का विवाह है। मेरे घरवाले बाद में में आएंगे, मैं कुछ पहले जा रही हूँ।''
''वह कौन है जो आपके साथ आया है?''
''वो... वो तो बड़े भाई साहब का कोई परिचित है। यहीं दिल्ली में नौकरी करता है। भाई साहब ने फोन कर दिया था। बेचारा सुबह से मेरे संग कुलियों की तरह घूम रहा है।''
मेरे अंदर जैसे कुछ कांच की तरह टूटा था। मैं तो अपनी दोस्ती को रिश्ते में बदलने के सपने देख रहा था और रंजना ने मुझे दोस्त के योग्य भी नहीं समझा।

सिगनल हो गया था। वह युवक अपने डिब्बे में चला गया था। मैंने आगे बढ़कर खिड़की से ही पानी की बोतल रंजना को थमाई और पूछा, ''कौन था?''
''मेरे मंगेतर का दोस्त।'' रंजना ने मुस्कराते हुए बताया ही था कि ट्रेन आगे सरकने लगी। आगे बढ़ती गाड़ी के साथ-साथ मैं कुछ दूर तक दौड़ना चाहता था, पर न जाने मेरे पैरों को क्या हो गया था। वे जैसे प्लेटफॉर्म से ही चिपक गए थे। मैं जहाँ खड़ा था, वहीं खड़ा रह गया।
धीमे-धीमे गाड़ी रफ्तार पकड़ती गई। मेरे और रंजना के बीच का फासला लगातार बढ़ता जा रहा था। देखते देखते रंजना एक बिंदु में तबदील हो कर एकाएक गायब हो गई।
मैं भारी कदमों से स्टेशन से बाहर निकला। मुझे बेहद गरमी महसूस हुई। इस मौसम को न जाने अचानक क्या हो गया था। सवेरे तो अच्छा-भला और खुशनुमा था, पर अब आग बरसा रहा था। क्या वाकई मौसम गरम था या मेरे अंदर जो आग मच रही थी, यह उसका सेक था?
- समाप्त -

वो बात रहस्य वाली!

वो बात रहस्य वाली!

जापान का एक सीधा सादा किसान अपने खेत में बैठकर जमीन खोदकर उसमें नीले रंग के बीज बो रहा था। वह न इधर देखता था, न उधर। तभी एक आदमी उधर से निकला। उसने थोड़ी देर इतने तन्मय होकर किसान को जमीन खोदते और उसमें बीज बोते देखा तो उत्सुकतावश रुक गया। सड़क से ही आवाज लगाई, ‘ओहियो गोÊारिमासु(नमस्कार, शुभ दिन)।’

किसान ने कोई जवाब नहीं दिया। न उसकी तरफ देखा। शायद इसने सुना ही नहीं हो इस लिए वह आदमी फिर से बोला, ‘ओ तेन्की’(भाई, आज का दिन कितना अच्छा है)।
किसान ने फिर भी कोई उत्तर नहीं दिया। वह आदमी भी थोड़ा अड़ियल किस्म का था। फिर से बोला, ‘हैलो दोस्त, अपने बगीचे में क्या बो रहे हो?’ किसान ने उसकी ओर देखा और फिर वापस अपने काम में लग गया। परन्तु उस आदमी को फिर भी वहीं खड़ा देखकर उसने अपने मुंह पर उंगली रखकर चुप रहने का संकेत करते हुए उसे पास आने का इशारा किया।

‘दोस्त, तुमने मेरे नमस्कार का उत्तर क्यों नहीं दिया? तुम बोलते क्यों नहीं? किसी अजनबी से तो बड़ा शिष्ट व्यवहार करना चाहिए। समूचा जापान अपने शिष्ट व्यवहार के लिए जाना जाता है।’ अजनबी ने थोड़े शिकायती लहज में कहा।

किसान ने उसे एकदम नÊादीक बुलाया और फिर उसके कान में धीरे से फुसफुसाया, ‘दोस्त, मेरी असभ्यता के लिए मुझे माफ करना। मेरी ऐसी कोई भावना नहीं थी। वास्तव में मैं अपने बगीचे में सेम के बीज बो रहा हूं।’‘सेम के बीज! लेकिन उसमें रहस्य की क्या बात है? इस मौसम में तो हर कोई सेम के बीज बोता है। बल्कि कुछ लोग तो गीत गुनगुनाते हुए भी बीज बोते हैं।’

अजनबी ने आश्चर्य से कहा।

‘अरे भाई, इतनी जोर से मत बोलो! मैं इन कबूतरों से बहुत परेशान हूं। मैं जो भी बीज बोता हूं, ये कबूतर वे सब खा लेते हैं। यदि मैं जोर से बोलता, तो वे सुन लेते और आकर मेरे सारे बीज खा जाते। इसीलिए मैं तुम्हें उत्तर नहीं दे रहा था, समझे।’ किसान ने उसे चुप रहने का रहस्य बताया। अजनबी ने उस मूर्ख किसान को घूर कर देखा और मुस्कुराता हुआ चला गया। उससे बोलता भी क्या? ऐसी सोच वाले व्यक्ति को समझाने से कोई लाभ भी तो न था।

लाश

लाश

सारा शहर सजा हुआ था। खास-खास सड़कों पर जगह-जगह फाटक बनाए गए थे। बिजली के खम्बों पर झंडे, दीवारों पर पोस्टर। वालंटियर कई दिनों से शहर में परचे बाँट रहे थे। मोर्चे की गतिविधियाँ तेज़ी पकड़ती जा रही थीं। ख़्याल तो यहाँ तक था कि शायद रेलें, बसें और हवाई यातायात भी ठप्प हो जाएगा। शहर-भर में भारी हड़ताल होगी और लाखों की संख्या में लोग जुलूस में भाग लेंगे।
शहर से बाहर एक मैदान में पूरा नगर ही बस गया था। दूर-दूर से टुकडियाँ आ रही थीं। कुछ टुकडियाँ ठेके की बसों में आई थीं। बसों पर भी झंडे थे। कपड़े की पट्टियों पर तहसील का नाम था। कुछ टुकड़ियों में औरतें भी थीं, बच्चे भी। औरतें खाली वक्त में अभियान गीत गाती रहतीं। by bharat darshan

केंद्रीय समिति ने कुछ नए नारे बनाए थे। ज़िला स्तर के कुछ लोग उन नारों का रियाज़ कर रहे थे। लंगर में आपाधापी थी। शहर के सब रास्ते, होटल, धर्मशालाएँ, सराएँ और मामूली रिश्तेदारों के घर प्रदर्शनकारियों से भरे हुए थे।

दो महीने पहले दर्जियों को झंडे और टोपी सिलने का ठेका दे दिया गया था। परचे और पोस्टरों का काम सात छापेख़ानों के पास था जिन परचों पर माँगें और नारे छपे थे, वे सब प्रदर्शनकारियों को बाँट दिए गए थे। पुलिस की सरगर्मी भी बढती जा रही थी। यातायात पुलिस ने नागरिकों की सुविधा के लिए ऐलान निकालने शुरू कर दिए- कि मोर्चे वाले दिन नागरिक शहर की किन-किन सडकों को इस्तेमाल न करें... कि नागरिक अपनी गाडियाँ इत्यादि सुरक्षित स्थानों पर रखें।

मोर्चे की विशालता का अंदाज़ लगाकर पुलिस कमिश्नर ने पी.ए.सी. को बुला लिया था। जिन-जिन सड़कों से जुलूस को गुज़रना था, उनकी इमारतों पर जगह-जगह सशस्त्र पुलिस तैनात कर दी थी। सड़कों के दोनों ओर सिर्फ वह पुलिस थी, जिसके पास डंडे थे... ताकि प्रदर्शनकारियों को ताव न आए। यह सब इंतज़ाम पुलिस कमिश्नर ने खुद ही कर लिया था।

अपने चौकस इंतज़ाम की खबर देने के लिए जब पुलिस कमिश्नर मुख्यमंत्री के पास पहुँचा तो उसका सारा तनाव खुद ही खत्म हो गया। मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई चिंता या परेशानी नहीं थी। वे हमेशा की तरह प्रसन्न मुद्रा में थे। गृहमंत्री धीरे-धीरे मुस्करा रहे थे। मुख्यमंत्री ने कुछ कहा तो पुलिस कमिश्नर ने तफ़सील देनी शुरू की- दो हजार लोकल फोर्स हैं, पाँच सौ  पी.एस.सी., चार सौ डिस्ट्रिक्ट से आया है, तीन सौ रेलवे का है, अस्सी जवान जेल से उठा लिए हैं, दो सौ होमगार्ड! इनमें से आठ सौ आर्म्ड हैं। हर पुलिस चौकी पर शैल्स का इंतजाम है। सोलह सौ लाठियाँ पिछले हफ़्ते आ गई थीं। साढ़े चार सौ का फोर्स सिविलियन है।

पुलिस कमिश्नर सब बताता जा रहा था, पर मुख्यमंत्री विशेष उत्सुकता से नहीं सुन रहे थे। गृहमंत्री भी बहुत दिलचस्पी नहीं ले रहे थे। कमिश्नर कुछ हैरान हुआ। उसने एक क्षण रुक कर उन दोनों की तरफ ताका, तो मुख्यमंत्री ने अपना चश्मा साफ करते हुए कहा, 'ख़्वामख़्वाह आपने इतनी तवालत की।

'इन विरोधी पार्टियों का कुछ भरोसा नहीं... अगर हम इंतज़ाम न करें तो...' कमिश्नर कह रहा था।

'मोर्चा शांत रहेगा।' गृहमंत्री ने कहा।

'क्या पता। कमिश्नर बोला, 'मुझे तो...'

मुख्यमंत्री ने बात काट दी- 'बहुत ऊधम नहीं मचेगा। बस जरा गुंडों पर नजर रखिएगा...'

'गुण्डे तो तीन-चौथाई से ज्यादा पकड़ लिए गए हैं... यह तो तीन दिन पहले ही कर लिया गया था। कुछ आज दोपहर बंद कर दिए जाएँगे।'

'ठीक है।'

'तो मैं इजाज़त लूँ?' कमिश्नर ने पूछा।

'ठीक है', मुख्यमंत्री ने कहा, 'अक्ल से काम लीजिएगा। मेरे ख्याल से आप मोर्चे  के
कर्ताधर्ताओं से मिलते हुए निकल जाइए। तीनों यहीं एम.एल.ए. हॉस्टल में टिके हुए हैं...

'जी मुझे मालूम है, पर शायद अब तक वे अपने पण्डाल में चले गए होंगे...।' कमिश्नर ने जरा सकुचाते हुए कहा, 'और वहाँ जाकर मिलना... मेरे ख़्याल से ठीक नहीं होगा...'

'वह यहीं होंगे... अरे भई, आपको मालूम नहीं, उनमें से कांति तो मेरे साथ जेल में रहे हैं। बड़े आदर्शवादी आदमी हैं... तेज और बेलाग। ऐसे विरोधी को तो मैं सर-माथे बिठाता हूँ। उनकी बस एक ही कमजोरी है- नींद! आप उनके सर पर नगाड़ा बजाइए, पर वे नहीं उठ सकते। जेल में भी यही आदत थी। सत्याग्रह आंदोलन के दिनों में भी! उन्हें नींद पूरी चाहिए... अभी वहीं होंगे...' मुख्यमंत्री ने तारीफ़ करते हुए आगे कहा, 'अब मोर्चे का मामला है, इसलिए शायद वे मिलने न आएं, नहीं तो हमेशा आते हैं... बेहद उम्दा आदमी है। भई, मैं तो उनकी बड़ी इज़्ज़त करता हूँ।'

'इस पार्टीबाजी और पॉलिटिक्स को क्या कहा जाए... कांतिलाल जी को तो सरकार में होना चाहिए था...' गृहमंत्री ने बड़े दुःख से कहा।

'बिलकुल... मुख्यमंत्री बोले, 'देखते जाइए, मिल जाए तो ठीक है... मेरा नमस्कार बोलिएगा। न हों तो पण्डाल जाने की जरूरत नहीं है...'

पुलिस कमिश्नर नया था। बहुत सकुचाते हुए बोला, 'मोर्चेवाले शायद आपका पुतला भी जलाएँगे, उसके बारे में...'

'अरे ठीक है, जलाने दीजिए... इससे आपका क़ानून कहाँ भंग होता है। जो उनके दिल में आए करने दीजिए, आप निगरानी रखिए, बस, आपकी यही जिम्मेदारी है। मुख्यमंत्री ने कहा और कुर्सी से उठ खड़े हुए।

चार बजे चौक मैदान से जुलूस चल पड़ा। मोर्चा जबरदस्त था। सबसे आगे झंडे और बिगुल थे। उनके पीछे अभियान गीत गाने वालों की टोली थी। उसके पीछे माँगों की तख्तियां पकड़े औरतों की टोली थी। उसके पीछे हज़ारों की संख्या में प्रदर्शनकारी थे। जगह-जगह से आए हुए लोग सब टोपियाँ लगाए थे। हाथों में छोटे-छोटे झंडे या माँगों की तख़्ती पकड़े थे। मोर्चा बहुत शान से चल रहा था। कतारों के दोनों तरफ कंधों से लाउडस्पीकर लटकाए नारे देने वाले वालंटियर थे। बीचों बीच झंडों से सजी जीप पर कांतिलाल, उनके साथी नेता और कुछेक महत्वपूर्ण लोग थे।

मोर्चा बढता जा रहा था। हर कोई चकित था। पता नहीं, इतने लोग एकाएक कहाँ से निकल पड़े थे। तमाशबीन नागरिकों की कतारें झंडेवाली पुलिस के पीछे से आश्चर्य से झाँक रही थीं।

सचमुच विश्वास नहीं होता था कि इतनी तादाद में लोग अभी जीवित होंगे  कि वे अब भी इन तरीक़ों पर भरोसा करते होंगे। शानदार और उमड़ता हुआ अपार जुलूस अदम्य शक्ति से बढ़ता जा रहा था। बड़े अख़बारों के फोटोग्राफर इमारतों पर चढ-चढकर हर मोड़ पर जुलूस के चित्र खींच रहे थे। कुछेक विदेशी फोटोग्राफर इस ऐतिहासिक मोर्चे को देखकर हैरान थे। वे जनतंत्र की ताकत के बारे में एकाध फ़िक़रा बोलकर अपने काम में मशग़ूल हो जाते थे। वे ज्यादातर आदिवासियों वाली टोली के चित्र उतार रहे थे। सरकारी फिल्म्स डिवीजन के कैमरामैन अपना काम कर रहे थे।

लम्बी सड़क पर जाते हुए जुलूस का दृश्य अदृश्य था। लाखों पैर-ही-पैर... लाखों सिर-ही-सिर। हज़ारों झंडे और उत्साह से भरे नारे...हहराता हुआ जनसमूह और समवेत गर्जन। कहीं न ओर न छोर। मीलों तक अजगर की तरह तभी एकाएक विध्वंस हो गया... जुलूस के अगले हिस्से में भगदड़ मच गई। सारा बाराबाँट हो गया। चारों तरफ बदहवासी भर गई। इमारतों की खिडकियों और दुकानों के दरवाजे तड-तड होने लगे। जुलूस दौड़ती-भागती चीखती-चिल्लाती बदहवास और अंधी भीड़ में दबल गया। चारों ओर भयंकर बदअमनी फैल गई। फिर धुएँ के बादल उठे... कुछ लपटें दिखाई दीं। तोड़फोड़ की गूँजती हुई आवाज़ें और घबराहट भरी चीखें आईं और गोलियाँ चलने की चटखती हुई तड़तड़ाहट से वातावरण व्याप्त हो गया। धुएँ के समुद्र में जैसे लाखों लोग ऊब-चूब रहे हों। गिरते-पड़ते और भागते हुए लोग। कुचले और अंगभंग हुए लोग... हुंकारे, चीखें, धमाके, शोर और तड़तड़ाहट।

देखते-देखते सब कुछ हो गया। सड़कों पर सिर्फ जूते-चप्पलें, झण्डे और माँगों की तख़्तियां रह गईं। फटे कपड़े, टोपियाँ, टूटे डंडे और फटी हुई पताकाएँ।

कुछ पता नहीं चला कि यह विध्वंस कैसे हुआ। क्यों हुआ? पुलिस की गाडियों में दंगाई और घायल भरे गए। घायलों को अस्पताल में पहुँचा दिया गया। दंगाइयों को दस मील ले जाकर छोड़ दिया गया। वे गुण्डे नहीं थे, गुण्डे पहले से बंद थे।

चोटें बहुतों को आई थीं। वे आपस में कुचल गए थे। पुलिस ने गोली चलाई जरूर थी, पर हवाई फ़ायर किए थे। उसकी गोली से एक भी आदमी घायल नहीं हुआ था। अंगों की सिर्फ टूट-फूट हुई थी।

सारा शहर सन्न रह गया था। ग़नीमत थी कि इतने बडे हादसे में सिर्फ एक लाश गिरी थी। वह लाश भी बिल्कुल सालिम थी। उसके न गोली लगी थी, न वह कहीं से घायल थी।
पुलिस ने लाश के चारों ओर से डेरा डाल लिया थ। पुलिस का कहना था कि लाश कांतिलाल की है। कांतिलाल ने यह सुना तो हैरान रह गए। भगदड़ और उस भयंकर हादसे से प्रकृतिस्थ होकर कुछ देर बाद वे लाश को देखने पहुँचे। उसे देखते ही कांतिलाल ने जोश से भरे स्वर में कहा - 'यह मुख्यमंत्री की लाश है।'

घटित हुए हादसे का मुआयना करने के लिए मुख्यमंत्री भी निकल चुके थे। उन्होंने यह सुना तो सकपकाए हुए पहुँचे। उन्होंने गौर से लाश को देखा और मुस्कराते हुए बोले- 'यह मेरी नहीं है।'
 
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